Monday, 6 January 2014

एक पाती केजरी बाबू के नाम

लख्ते ज़िगर केजरी बाबू,
                                   जय आम आदमी की!
            चाचा बनारसी की आदत है सबको जय रामजी कीकहने की। लेकिन बचवा, तोके अगर हम जय रामजी की कह देंगे तो तोहरे सेकुलरिज्म पर खतरा पैदा हो जायेगा। इसलिये तोरे भलाई के खातिर हम रामजी का परित्याग कर दिये हैं। तोहार कुर्सी बनल रहे, ओह बदे झूठ-सांच, वचन-पालन, वचन-भंग, भ्रष्टाचार, शिष्टाचार - जो भी करना पड़े, हम करेंगे। बबुआ, ई जनता और मीडिया से हमेशा होशियार रहना। दो दिन में यह बांस पर चढ़ा देती है और तीसरे दिन बिना नोटिस के बंसवा खींच भी लेती है। बड़ी बेमुर्रवत कौम हैं, ये दोनों। अब तुम्हीं देखो न, पांच दिन तक ये दोनों तुम्हारे नाम का कीर्तन राउन्ड द क्लाक करते रहे। छठवें दिन जब तुमने अपने १० बीएचके में गृह-प्रवेश का मुहुरत निकलवाया, तो ये दो कौड़ी के मीडिया रिपोर्टर ईर्ष्या की आग में जलने लगे। तुम्हारे घर का, फ़र्श का, मोडुलर किचेन का, बाथ-रूम का, बालकोनी का, लान का लाइव पोस्टमार्टम करने लगे। अगर हिम्मत हो, तो १०, जनपथ का फोटो दिखायें। हवा खिसक जायेगी। और तुम भी बचवा, इनकी बातों में आ गये। गृह-प्रवेश करने के बदले गृह-निकास कर गये। ऐसे ही इनकी चालों में फंसते गये, तो बहुत जल्दी ये तुमको मुख्यमंत्री कार्यालय से भी निकलवा देंगे। आरे, जब मुख्यमंत्री बने हो, तो मुख्यमंत्री के दफ़्तर से ही काम करोगे न। सचिवालय, वज़ीराबाद के स्लम में तो बनाओगे नहीं। फिर मुख्यमंत्री निवास में रहने से काहे परहेज़ कर रहो हो। या तो उसे बेघर और फूटपाथ पर सोनेवालों का रैन-बसेरा बना दो, या खुद रहो। खाली छोड़ने से का फायदा। मोटे-मोटे चूहे उसमें रहकर आबादी बढ़ायेंगे, दिल्ली का खाद्यान्न चट करेंगे, आम जनता फ़्री में राशन की मांग करेगी, हर्षवर्धन तुम्हारी राह पर चलते हुए तीन दिन में देने का वादा भी कर देगा। फिर खड़ा हो जायेगा तुम्हारी मुसीबतों का पहाड़। बेटा आम आदमी-आम आदमी जपते रहो, पर करो अपने मन की। आई.ए.एस. की नौकरी छोड़कर राजनीति में कोई योग सिखाने तो आये नहीं हो। नफ़ा-नुकसान तो तौल ही लिया होगा। फिर तुम अन्ना हजारे तो हो नहीं कि रालेगन सिद्धि के यादव-मन्दिर में रहकर गुज़ारा कर लोगे। तुम खाते-पीते घर के हो। व्यापार तुम्हारा खानदानी पेशा है। पत्नी इन्कम टैक्स कमिश्नर है। बच्चे स्कूल भी एसी बस से जाते हैं। उन्हें अच्छा खाने-पीने की आदत है। वे अच्छे घर में नहीं रहेंगे, तो क्या झुग्गी में रहेंगे। पत्रकारों को अपना कौशाम्बी, गाज़ियाबाद वाला ४ बीएचके कभी मत दिखाना। वे चार एसी देखकर चकरा जायेंगे। शीला दीक्षित की कुर्सी पर तो कब्ज़ा कर ही लिया, घर पर भी कब्ज़ा करो। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।
      आजकल कांग्रेस से तुम्हारे गठबन्धन पर तरह-तरह की टीका-टिप्पणी हो रही है। तनिको मत घबराना। गठबन्धन को राष्ट्रीय धर्म का दर्ज़ा प्राप्त है। जो भाजपाई तुम्हारे कांग्रेस की गोद में बैठने की आलोचना पानी पी-पीकर कर रहे हैं, उन्हें याद दिला दो कि उनके आदर्श नेता अटलजी ने भी छः साल तक गठबन्धन सरकार चलाई थी। तुमने तो सिर्फ एक से गठबन्धन किया है। एक से गठबन्धन कर ज़िन्दगी भर साथ निभानेवाले को मर्यादा पुरुषोत्तम और साथ निभानेवाली को पतिव्रता कहते हैं। माना कि कांग्रेस हिन्दुस्तान की सबसे भ्रष्ट पार्टी है, पर है तो वफ़ादार। तुमने उसकी जितनी आलोचना की है, उसका अगर १% भी अपनी बीवी का कर देते, तो कभी का तलाक हो चुका होता। तुम्हारे और कांग्रेस की पाक मुहब्बत पर जलने वालों की नज़र न लगे। बुरी नज़र वाले, तेरा मुंह काला।
      स्वाधीन भारत का इतिहास गवाह है कि हिन्दुस्तान के सभी नेता कांग्रेस को गाली देकर ही आगे बढ़े हैं। तुमने कोई अनोखा काम तो किया नहीं है। स्व. वी.पी.सिंह बोफ़ोर्स का दस्तावेज़ लेकर हिन्दुस्तान भर घूमे। कहते थे कि प्रधान मंत्री बनते ही राजीव गांधी को गिरफ़्तार कर लेंगे और दलाली का पैसा खज़ाने में जमा करायेंगे। क्या किया सबको मालूम है। तुमने भी शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार की ३७० पेज की फाईल चुनाव के पहले जनता को दिखाई थी। जब देश का एक प्रधान मंत्री अपने चुनावी वादे को पूरा नहीं कर पाया, तो दिल्ली जैसे अपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री से ऐसी आशा करना क्या वाज़िब है। बेटा, कुत्ता भी जिसकी रोटी खाता है, उसके आगे दुम हिलाता है। तुम्हारे आगे तो शीला ने सोने की थाली में जिमना परोसा है। जिमो रजा, जी भर के जिमो। नमक हरामी मत करना। संकोच मत करना। लालू, मुलायम, मायावती, सिबू सोरेन, शरद पवार, नीतिश आदि-आदि, कितने नाम गिनायें, सभी तो जिम ही रहे हैं। तुम अपवाद नहीं हो। अच्छा किया, हर्षवर्धन को सबूत लाने का जिम्मा सौंप दिया।
      बचवा, तुम्हारी बुद्धि का लोहा पूरा हिन्दुस्तान मान गया। फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन भी मानता है, भटकल भी मानता है और विनायक सेन भी मानता है। मैगसेसे पुरस्कार कोई फोकट में तो मिलता नहीं है? दिल्ली वालों को बिजली-पानी में उलझाये रखो। इन लोगों को ओसामा बिन लादेन ने अगर फ़्री बिजली पानी देने का वादा किया होता, तो उसके लिये दिल्ली में परमाणु निरोधक बंकर बना देते, प्रधान मंत्री बनाते अलग से। वह आज भी जीवित रहता। पाकिस्तान कश्मीर को ले ले, चीन मेघालय को कब्ज़िया ले, नक्सलवादी देश को तबाह कर दें, आतंकवादी हत्या का ताण्डव करते रहें, प्याज़ सौ रुपये किलो बिकता रहे, लाखों करोड़ रुपये स्विस बैंक में पड़ा रहे, कोई बात नहीं। इन विषयों पर बोलने की गलती कभी मत करना। बस बिजली-पानी पर बोलना। चलते-चलते एक सलाह और - राजमाता, राज जमाता और शहज़ादे की अच्छी खिदमत करना। यह कभी मत भूलना कि वे क्वीन हैं और तुम प्यादे हो। चाचा की बात को गंठिया लो।
      मैं यहां ठीके-ठाक हूं। बुआ और बहिना के यहां खिचड़ी भेजना है। पाकेट में एको छदाम नहीं है। दिहाड़ी की कमाई से नमक, मुरई और रोटी का इन्तज़ाम हो जाता है। अपना सालाना बज़ट तुम्हारे एक बच्चे की एक महीने की फीस से ज्यादा नहीं है। कुछ मनी आर्डर से भेज दोगे तो खिचड़ी भी भेज देंगे और एक कथरी आ एगो कम्बल भी खरीद लेंगे। बाल-बच्चों को हमार प्यार-दुलार कहना और दुल्हिन को आशीर्वाद। इति शुभ।
            तुम्हारा अपना

            चाचा बनारसी

Thursday, 12 December 2013

सपनों का सौदागर - अरविन्द केजरीवाल

       भोजपुरी में एक कहावत है - ना खेलब आ ना खेले देब, खेलवे बिगाड़ देब। इसका अर्थ है - न खेलूंगा, न खेलने दूंगा; खेल ही बिगाड़ दूंगा। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी ‘आप’ ने चुनाव के बाद गैर जिम्मेदराना वक्तव्य और काम की सारी सीमायें लांघ दी है। दिल्ली में पिछले १० वर्षों से कांग्रेस सत्ता में थी। वहां की दुर्व्यवस्था, भ्रष्टाचार और निकम्मेपन के लिये कांग्रेस और सिर्फ कांग्रेस ही जिम्मेदार है। इस चुनाव में दिल्ली की जनता ने कांग्रेस के खिलाफ़ मतदान किया जिसकी परिणति आप के उदय और भाजपा का सबसे बड़े दल के रूप में उभरना रही। इस समय आप के नेताओं के बयान कांग्रेस के विरोध में न होकर पूरी तरह भाजपा के अन्ध विरोध में आ रहे हैं। भाजपा की बस इतनी गलती है कि उसने अल्पसंख्यक सरकार बनाने से इन्कार कर दिया है। बस, यही बहाना है ‘आप’ के पास असंसदीय शब्दों में गाली-गलौज करने का। श्री हर्षवर्धन और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के धैर्य और संयम की प्रशंसा करनी चाहिये कि उन्होंने अबतक शालीनता का परिचय देते हुए गाली-गलौज से अपने को दूर रखा है। 
आज मुझे यह कहने में न तो कोई झिझक हो रही है और न कोई संकोच कि अरविन्द केजरीवाल विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना हैं। वे दो एन.जी.ओ. - ‘परिवर्तन’ तथा ‘कबीर’ और एक क्षेत्रीय पार्टी ‘आप’ के सर्वेसर्वा हैं। उनकी संस्थायें विदेशी पैसों से चलती हैं। उन्होंने अपनी संस्थाओं के लिये फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन, अमेरिका से वर्ष २००५ में १७२००० डालर तथा वर्ष २००६ में १९७००० डालर प्राप्त किये जिसके खर्चे का हिसाब-किताब वे आज तक नहीं दे पाये हैं, जबकि उक्त धनराशि प्राप्त करने की बात उन्होंने स्वीकार की है। फ़ोर्ड एक मंजे हुए उद्यमी हैं। बिना लाभ की प्रत्याशा के वे एक फूटी कौड़ी भी नहीं दे सकते। केजरीवाल की संस्थाओं के संबन्ध विश्व के तीसरे देशों की सरकारों को अस्थिर कर अमेरिकी हित के अनुसार सत्ता परिवर्त्तन कराने के लिये बेहिसाब धन खर्च करनेवाली कुख्यात संस्था ‘आवाज़’ से है। ‘आवाज़’ एक अमेरिकी एन.जी.ओ. है जिसका संचालन सरकार के इशारे पर वहां के कुछ बड़े उद्योगपति करते हैं। इस संस्था का बजट भारत के आम बजट के आस-पास है। यह संस्था अमेरिका के इशारे पर अमेरिका या पश्चिम विरोधी सरकार के खिलाफ Paid Agitation चलवाती है, वहां व्यवस्था और संविधान को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है और अन्त में अपनी कठपुतली सरकार बनवाकर सारे सूत्र अपने हाथ में ले लेती है। जैसमिन रिवोल्यूशन के नाम पर इस संस्था ने लीबिया में सत्ता-परिवर्त्तन किया, तहरीर चौक पर आन्दोलन करवाया, मिस्र को अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति में ढकेल दिया तथा सीरिया में गृह-युद्ध कराकर लाखों निर्दोष नागरिकों को भेड़-बकरी की तरह मरवा दिया। वही पश्चिमी शक्तियां ‘आवाज़’ और फ़ोर्ड के माध्यम से केजरीवाल में पूंजी-निवेश कर रही हैं। यही कारण है कि कांग्रेस द्वारा बिना शर्त समर्थन देने के बाद भी अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में सरकार बनाने से बार-बार इन्कार कर रहे हैं। उन्होंने दिल्ली की जनता से जो झूठे और कभी पूरा न होनेवाले हवाई वादे किये हैं, वे भी जानते हैं कि उन्हें पूरा करना कठिन ही नहीं असंभव है। दिल्ली की जनता ने उन्हें ७०/७० सीटें भी दी होती, तो क्या वे बिजली के बिल में ५०% की कटौती कर पाते, निःशुल्क पानी दे पाते या बेघर लोगों को पक्का मकान दे पाते? मुझे पुरानी हिन्दी फिल्म श्री ४२० की कहानी आंखों के सामने आ जाती है - नायक ने बड़ी चालाकी से बंबई के फुटपाथ पर सोनेवालों में इस बात का प्रचार किया कि गरीबों की भलाई के लिये एक ऐसी कंपनी आई है जो सिर्फ सौ रुपये में उन्हें पक्का मकान मुहैया करायेगी। गरीब लोगों ने पेट काटकर रुपये बचाये और कंपनी को दिये। लाखों लोगों द्वारा दिये गये करोड़ों रुपये पाकर कंपनी अपना कार्यालय बन्द कर भागने की फ़िराक में लग गई। फुटपाथ पर सोने वालों का अपना घर  पाने का सपना, सपना ही रह गया। राज कपूर ने आज की सच्चाई की भविष्यवाणी सन १९५४ में ही कर दी थी। आज भी तमाम चिट-फंड कंपनियां सपने बेचकर करोड़ों कमाती हैं और फिर चंपत हो जाती हैं। अरविन्द केजरीवाल भी सपनों के सौदागर हैं। इस खेल में फिलवक्त उन्होंने कम से कम दिल्ली में इन्दिरा गांधी और सोनिया गांधी को मात दे दी है। वे राजनीति की प्रथम चिट-फंड पार्टी के जनक है। तभी तो कांग्रेस द्वारा समर्थन दिये जाने के बाद भी, २८+८=३६ का जादुई आंकड़ा छूने के पश्चात भी राज्यपाल से मिलने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। दिल्ली की अधिकारविहीन सरकार के पास गिरवी रखने के लिये  है भी क्या? कोई ताजमहल भी तो नहीं है। वे चन्द्रशेखर की तरह भारत के प्रधान मंत्री भी नहीं होंगे जो देश के संचित सोने को गिरवी रखकर कम से कम चार महीने अपनी सरकार चला ले।
जिस अन्ना हजारे के कंधे पर खड़े होकर उन्होंने प्रसिद्धि पाई, उसी का साथ छोड़ा। अन्ना ने पिछले साल ६ दिसंबर को संवाददाता सम्मेलन में केजरीवाल को स्वार्थी और घोर लालची कहा था। अन्ना कभी झूठ नहीं बोलते। केजरीवाल का उद्देश कभी भी व्यवस्था परिवर्त्तन नहीं रहा है। सिर्फ हंगामा खड़ा करना और अव्यवस्था फैलाना ही उनका मकसद है। भारत को सीरिया और मिस्र बनाना ही उनका लक्ष्य है। साथ देने के लिये सपना देखने वाले गरीब, हत्या को मज़हब मानने वाले नक्सलवादी और पैन इस्लाम का नारा देनेवाले आतंकवादी तो हैं ही। लेकिन पानी के बुलबुले का अस्तित्व लंबे समय तक नहीं रहता। जनता सब देख रही है। जिस जनता ने राहुल की उम्मीदों पर झाड़ू फेर दिया है, अपनी उम्मीदों और सपनों के टूटने पर सपनों के सौदागर केजरीवाल के मुंह पर भी झाड़ू फेर दे, तो कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं होगा। शुभम भवेत। इति।